
Car AC Recirculation Mode
Car AC Recirculation Mode: सर्दियों की सुबह हो या गर्मियों की तपती दोपहर, हम कार में जैसे ही बैठते हैं वैसे ही AC ऑन कर लेते हैं और विंडो को बंद कर देते हैं। हममें से ज्यादातर लोग कार के एयर रिसर्कुलेशन (Air Recirculation) मोड (हवा को अंदर ही घुमाने वाला बटन) को ऑन रखते हैं ताकि केबिन जल्दी ठंडा हो जाए या बाहर का प्रदूषण और धूल अंदर न आए। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हाइवे पर ड्राइव करते समय अचानक आने वाली वो सुस्ती या भारीपन सिर्फ थकान की वजह से नहीं, बल्कि आपके AC की सेटिंग्स की वजह से हो सकता है?
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक चेतावनी वायरल हुई थी, जिसमें दावा किया गया था कि कार में एयर-रीसर्कुलेशन बटन को लंबे समय तक ऑन रखना खतरनाक हो सकता है।
'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह दावा सिर्फ डराने के लिए नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक ठोस वैज्ञानिक वजह है। एस्टर व्हाइटफील्ड हॉस्पिटल की पल्मोनोलॉजिस्ट (फेफड़ों की विशेषज्ञ) डॉ. अनिका पारिकर ने इस रिपोर्ट में बताया है कि यह आदत कैसे ड्राइवरों के लिए एक 'खामोश खतरे' की तरह है।
अक्सर लोगों को लगता है कि अगर कार पूरी तरह बंद रही तो ऑक्सीजन खत्म हो जाएगी। लेकिन डॉ. पारिकर के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि असल दुश्मन ऑक्सीजन की कमी नहीं, बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की अधिकता है।
जब आप 'Recirculation Mode' ऑन करते हैं तो कार बाहर की ताजी हवा लेना बंद कर देती है। कार के अंदर वही हवा बार-बार घूमती है। हम सांस लेते समय ऑक्सीजन लेते हैं और CO2 छोड़ते हैं। एक बंद कार में, खासकर जब उसमें एक से ज्यादा लोग बैठे हों, तो कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बहुत तेजी से बढ़ता है।
डॉक्टरों के मुताबिक, खराब वेंटिलेशन या 'बासी हवा' का सीधा असर हमारे दिमाग की सतर्कता (Alertness) पर पड़ता है। भले ही केबिन में ऑक्सीजन मौजूद हो, लेकिन बढ़ी हुई CO2 उसे दिमाग तक सही ढंग से पहुंचने नहीं देती है। इससे ड्राइवर को 'मेंटल फॉग' यानी दिमागी धुंधलापन महसूस होने लगता है।सोचने-समझने की क्षमता धीमी हो जाती है और आंखों में भारीपन आने लगता है।
हाइवे पर 80 या 100 की रफ्तार में चल रही गाड़ी में अगर ड्राइवर का रिएक्शन टाइम एक सेकंड के लिए भी धीमा हो जाए, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है। जिसे हम अक्सर 'थकान' समझकर इग्नोर कर देते हैं वो असल में शरीर में CO2 बढ़ने के लक्षण हो सकते हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर फ्रेश एयर मोड का इस्तेमाल न किया जाए, तो महज एक से दो घंटे के अंदर कार में CO2 का लेवल इतना बढ़ सकता है कि ड्राइवर को उबासी आने लगे। आधुनिक कारें काफी अच्छी तरह से सील होती हैं, जिससे हवा का प्राकृतिक रिसाव बहुत कम होता है। ऐसे में यह खतरा और बढ़ जाता है।
हालांकि, डॉ. पारिकर यह भी साफ करती हैं कि इससे किसी की सीधे तौर पर मौत नहीं होती, क्योंकि कारें पनडुब्बी की तरह एयरटाइट नहीं होती हैं। खतरा यह नहीं कि हवा खराब हो जाएगी, बल्कि ड्राइवर को नींद (Sleepiness while driving) आने लगती है और यही सबसे बड़ा जोखिम है।
नीचे दिए जा रहे संकेतों को कभी इग्नोर न करें अगर ड्राइव करते समय आपको या आपके को-पैसेंजर्स को ये लक्षण महसूस हों, तो तुरंत सतर्क हो जाएं।
ये संकेत बताते हैं कि आपकी कार अब 'गैस चैंबर' जैसी बन रही है और उसे तुरंत ताजी हवा की जरूरत है।
इसका मतलब यह नहीं कि आप प्रदूषण में खिड़कियां खोलकर ड्राइव करें। विशेषज्ञों ने इसके लिए एक 'स्मार्ट रूटीन' सुझाया है।
30 मिनट का नियम: लंबी ड्राइव पर हर 30 मिनट या एक घंटे में रीसर्कुलेशन मोड को बंद करें और कुछ देर के लिए 'फ्रेश एयर' मोड चालू करें।
शीशे नीचे करें: अगर मौसम अच्छा है तो बीच-बीच में एक-दो मिनट के लिए खिड़कियां थोड़ी खोल दें। इससे अंदर की बासी हवा तुरंत बाहर निकल जाएगी।
भीड़ में सावधानी: कार में जितने ज्यादा लोग होंगे, CO2 उतनी ही जल्दी बढ़ेगी। इसलिए अगर पूरी फैमिली साथ है तो वेंटिलेशन का ज्यादा ध्यान रखें।
अगली बार जब आप लंबी यात्रा पर निकलें, तो याद रखें AC की ठंडक अच्छी है, लेकिन बीच-बीच में ताजी हवा आपके और आपके परिवार की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। एक छोटा सा बटन दबाना किसी बड़े हादसे को टाल सकता है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल मीडिया रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी सटीक जानकारी के लिए हमेशा अपने चिकित्सक या विशेषज्ञ से सलाह लें।
Published on:
29 Nov 2025 10:40 am
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