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किस्सा: ….जब बेदाग श्रीप्रकाश जायसवाल को झेलना पड़ा था ‘दाग’ का दंश

पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का शुक्रवार को कानपुर में कार्डियक अरेस्ट से निधन हो गया। वे 81 साल के थे। आपको बताते हैं कब बेदाग जायसवाल को दाग का दंश झेलना पड़ा था।

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former union minister shriprakash jaiswal had endure this stain know full story

Shriprakash Jaiswal: किस्सा: ....जब बेदाग श्रीप्रकाश जायसवाल को झेलना पड़ा था 'दाग' का दंश। फोटो सोर्स- X (@Sheilza29)

Shriprakash Jaiswal:

बात 2005 की है। कानपुर में हमारी बुआ के बेटे मनोज त्रिवेदी की शोभन सरकार की भतीजी रचना से शादी हो रही थी। समारोह दर्शन पुरवा के एक मैरिज हाल में चल रहा था। अचानक देश के गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल आये। वरवधू को आशीर्वाद दिया। इसके बाद चाचा से बोले, दिल्ली से आया तो पता चला कि घर में शादी है। लगता है कार्ड कहीं मिस हो गया था। तुरंत खोजते हुए यहां आ गया। हमें पता है कि आपने कार्ड तो भेजा ही होगा। जबकि सच्चाई यह थी कि हमारे घर में यह विचारकर उन्हें कार्ड नहीं, भेजा गया था कि अब वे केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हैं, कहां आएंगे? उनके लिए उनके प्रोटोकॉल के मुताबिक व्यवस्था कैसे करेंगे? उनकी बातें सुनकर हम सभी शर्मिंदा थे मगर निःशब्द!

आज जब श्रीप्रकाश जायसवाल हमारे बीच नहीं रहे, तब उनका कानपुर शहर के हर इलाके में दीवारों पर लिखा श्लोगन याद आता है “आपका श्रीप्रकाश जायसवाल”। जी हां, वो कानपुर के श्रीप्रकाश जायसवाल ही थे, सरल, सहज, विनम्र और दृढ़ निश्चयी। कानपुर से जुड़ी हमारी तमाम यादें उनके व्यक्तित्व और सहज जननेता की मौजूद हैं। वामपंथी और फिर दक्षिणपंथी राजनीति में फंसी रहने वाली कानपुर लोकसभा सीट पर लगातार तीन बार कांग्रेस की टिकट पर जीतकर उन्होंने कांग्रेस को मजबूती दी थी। कभी एशिया का मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर के कायाकल्प के लिए केंद्र सरकार से कई अहम योजनाएं श्रीप्रकाश जायसवाल ही लेकर आये थे। भाजपा को उन्हें हराने के लिए डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसा कद्दावर उतारना पड़ा था।

सबसे अहम यह है कि कानपुर शहर के अध्यक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक उन्होंने कांग्रेस को संक्रमण काल में संभाला और मजबूती दी। कानपुर के मेयर रहते हुए उन्होंने विरोधी सरकारों में भी लड़कर शहर के विकास का जनोन्मुखी मॉडल तैयार किया। श्रीप्रकाश किसी एक कौम या जाति के नेता नहीं थे, बल्कि सभी के थे। जायसवाल समुदाय की आबादी कानपुर में बहुत सीमित है मगर उन्होंने गांधी-नेहरू की नीति सभी को सहेजने के तहत “आपका श्रीप्रकाश जायसवाल” बनकर अपनी जगह कानपुर और फिर आगे बढ़कर यूपी और देश और दुनिया में बनाई।

2009 जब वह केंद्रीय मंत्री थे, उसी वक्त आस्ट्रेलिया में भारतीय समुदाय के नागरिकों और मंदिरों पर कुछ नस्लीय हमले हुए थे, तब डॉ मनमोहन सिंह ने उन्हें वहां भेजा। आस्ट्रेलिया में जाकर उन्होंने मौके पर पड़ताल की। सभी पक्षों से मिले और वहां के नेता प्रतिपक्ष से मिलकर भारतीय छात्रों-नागरिकों के प्रति सद्भाव के संबंध बनाने पर जोर दिया। उसका अच्छा असर हुआ और फिर वहां का प्रतिनिधिमंडल भारत मिलने आया।

दुखद पहलू यह है कि जब वह कोयल और सांख्यकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्री के तौर पर काम कर रहे थे, तभी कैग की एक रिपोर्ट में उनका मंत्रालय विवादों में आ गया। हालांकि वह कथित विवादित नीति उनके वक्त की नहीं थी। बावजूद इसके, सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का जवाब देने का जिम्मा उनका ही था। उन्होंने डटकर मुकाबला किया। आरोप लगाने वाली भाजपा हो या सिविल सोसाइटी सहित तमाम संगठनों को ओपेन डिबेट करने की चुनौती भी दी।

वह सवालों से भागे नहीं बल्कि हर बात का जवाब दिया। जब कैग विनोद राय ने विदेश में भारत सरकार पर गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी की थी, तब भी उन्होंने उनके खिलाफ कोई टिप्पणी करने से यह कहते हुए इंकार किया था, कि उनकी जो समझ है, वह कह रहे हैं। हम तथ्यों के साथ सच बता रहे हैं, जो सदैव सही साबित होगा। वही हुआ, अदालतों ने हर आरोप को गलत साबित किया। भ्रष्टाचार का जो आरोप कोयला मंत्रालय पर लगा, उस वक्त श्रीप्रकाश जायसवाल उसके मंत्री नहीं थे मगर उसका दाग उन पर लगाकर 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके खिलाफ कानपुर में प्रचार किया गया। वह चुनाव हार गये। यह भारत की राजनीति में एक ईमानदार सच्चे जनप्रतिनिधि के लिए दुखद रहा था। उन्होंने किसी भी दबाव में अपनी राजनीतिक निष्ठा को नहीं बदला, तभी तो वे “आपका श्रीप्रकाश जायसवाल” आखिरी सांस तक बने रहे।
विनम्र श्रद्धांजलि।