
guru tegh bahadur
350वें शहीदी दिवस पर विशेष :
चौदहवीं व पंद्रहवी शताब्दी में भारत बाहरी आक्रान्ताओं के अत्याचार, कट्टर धर्मान्धता से ग्रस्त था। बाबर के समय हो रहे अत्याचारों पर सिख परम्परा के पहले गुरु गुरुनानक देव जी ने अपनी वाणी में कहा- ‘खुरासान खसमाना कीआ हिंदुसतान डराइआ।। आपै दोसु न देई करता जमु कर मुगल चड़ाइआ।। एती मार पई करलाणे तैं की दरद न आइआ।।’ अर्थात खुरासान से आए हुए मुगल आक्रान्ता ने हिन्दुस्तान की जनता को डरा रखा है व अत्याचार कर रखे हैं और हे ईश्वर क्या आपको अत्याचार से पीडि़त लोगों के लिए दर्द अनुभव नहीं हो रहा। बाहरी आक्रान्ताओं के अत्याचार निरन्तर जारी रहे तथा पांचवें गुरु गुरु अर्जुन देव जी पर तत्कालीन शासक जहांगीर के आदेश से जलती हुई रेत डाली गई, जलती हुई लाल कढाही में डाला गया, गरम जल से नहलाया गया और उनकी जीवनलीला समाप्त कर दी गई। रामधारी सिंह जी दिनकर ने अपनी पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखा है कि तब तथाकथित सुविख्यात जहांगीरी न्याय का यह उदाहरण संसार के सामने आया।
औरंगजेब के शासन काल में वृहतर समाज पर अत्याचारों व जबरन धर्मान्तरण की पराकाष्ठा होने लगी। उसने मथुरा, काशी, गुजरात, उडीसा, बंगाल, राजस्थान, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश आदि में मंदिरों को तुड़वाना व बहुसंख्यक समाज पर अतिरिक्त कर (जजिया) लगा दिया। उसने अपने अधिकारियों को हुक्म दिया कि बहुसंख्यक समाज के लोगों के माथे से तिलक मिटा दिए जाएं और उनके जनेऊ उतारकर जबरन धर्मान्तरण कर दिया जाए। ऐसी परिस्थितियों में 500 कश्मीरी पंडितों का जत्था गुरु तेग बहादुर जी के पास आनन्दपुर साहिब पंजाब पहुंचा व शासक के जुल्म से बचाने का आग्रह किया। तब गुरु जी ने उस दल से कहा कि जाओ और बादशाह के सिपहसलारों से कहो कि पहले गुरु तेग बहादुर को धर्मान्तरण कबूल करने के लिए मनाएं फिर हम सब इस्लाम कबूल कर लेंगे। गुरु जी निर्दोष व मासूम लोगों को निष्ठुरता व जुल्म से बचाने के लिए अपने शिष्य भाई मतीदास, सतीदास और भाई दयाला जी के साथ आनन्दपुर साहिब छोड़ पटियाला, धमतान, जींद, रोहतक, आगरा के रास्ते दिल्ली के लिए रवाना हो गए।
औरंगजेब दिल्ली से बाहर गया हुआ था। उसके वजीरों ने गुरु जी को बादशाह के हुक्म अनुसार इस्लाम धर्म कबूल करने के लिए कहा। 12 मार्गशीर्ष 1732 तद्नुसार 23 नवम्बर 1675 का दिन था। जब हर कोशिश के बावजूद गुरुजी नहीं माने तो उन्हें डराने व झुकाने के लिए भाई मतीदास जी को लकड़ी के घेरे में खड़ा कर एक बड़े आरे से चिरवाया गया। 24 नवम्बर को भाई दयाला जी को उबलते पानी की देग में डाल दिया गया। फिर सतीदास जी को रूई में लपेटकर आग लगा दी गई।
बादशाह के आदेश से गुरु जी को तंग पिंजरे में कैद कर दिया गया व उनके सामने तीन शर्तें रखी गईं। पहली कोई करामात करिश्मा दिखाइए या दूसरी इस्लाम कबूल कीजिए या तीसरी फिर मृत्यु के लिए तैयार हो जाइए। गुरु जी के इन शर्तों को मानने से इनकार करने पर शाही फरमान आया कि चांदनी चौक में लोगों के सामने इन्हें मार डाला जाए। 1675 में 25 नवम्बर के दिन गुरु जी ने प्रात:काल स्नान किया व जपुजी साहब का पाठ किया। बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ एकत्रित हो गई। आसमान पर बादल और काली घटाएं छायी हुई थी, तेज हवाएं चल रही थी, जल्लाद आया और तलवार से गुरु जी का सिर धड़ से अलग कर दिया गया।
गुरुजी के शहीद होते ही हाहाकार मच गया ‘यह तो जुल्म है इतने बड़े संत का क्यों कत्ल कर दिया गया है, यह शासन अब ज्यादा चलने वाला नहीं’। प्रकृति ने ऐसा रूप धारण किया कि आंधी तूफान के कारण मुगल सिपाहियों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। चारों ओर भगदड़ मच गई। इस भागदौड़ में गुरु जी के एक श्रद्धालु ‘भाई जैता’ आगे बढे, फुर्ती से गुरु जी का सीस उठाया, श्रद्धा से अपने कपड़ों में लपेट लिया और अपने दो साथियों ‘भाई नानू’ और ‘भाई ऊद्धा’ को साथ लिया तथा छिपते-छिपाते पांच दिन की यात्रा पश्चात कीरतपुर पंजाब जा पहुंचे। जैता जी ने बोझिल मन से गुरु जी के सीस को उनके सुपुत्र गोविन्द राय जी के आगे रखा। गोविन्द राय जी ने भाई जैता जी के साहसिक कार्य को सरहाते हुए कहा ‘रंगरेटे गुरु के बेटे’। भाई जैता जी एक पिछड़ी जाति ‘रंगरेटा’ समाज के थे। गुरु तेग बहादुर जी के सीस का बड़े सत्कार के साथ आनन्दपुर साहिब में संस्कार किया गया जहां पर वर्तमान में बहुत ही सुन्दर गुरुद्वारा सुशोभित है। उधर दिल्ली में गुरु जी के एक और श्रद्धालु शिष्य ‘लखी शाह बंजारा’ व उसका बेटा ‘नगाहिया’, रूई और दूसरे सामान की कई बैलगाडियां लेकर चांदनी चौक पहुंचे और भीड़ को चीरते हुए आगे आए, बड़ी फुर्ती से गुरु जी के धड़ को उठाया, रूई के ढेर में छिपाया तथा गाडिय़ों को हॉक कर अपनी बस्ती रायसीना ले गए। इस दृश्य को उस वक्त के एक गायक केसौ भट्ट ने इस तरह वर्णन किया है :
चलो चलाई हो रही, गड़ गड़ बरसे मेघ
लखी नगाहिया ले गए, तू खड़ा तमाशा देख
दूसरी तरफ मुगल सिपाही परेशान थे कि गुरु जी का सीस और धड़ कहां गायब हो गया। लखी शाह गुरु जी के धड़ को सत्कार से अपने घर जो वर्तमान रायसीना हिल पर स्थित था, ले गए और अंतिम संस्कार के लिए अरदास ‘प्रार्थना’ के पश्चात उन्होंने अपने घर को ही आग लगा दी। मुगल फौज और लोगों ने यही समझा कि लखी शाह के घर को ही आग लग गई है। इस तरह ईश्वर ने ‘भाई जैता’ और ‘भाई लखी शाह’ के साहसिक कार्य द्वारा गुरु जी के शरीर का अपमान होने से बचा लिया। जहां लखी शाह ने अपने घर को आग लगाकर गुरु जी के धड़ का अंतिम संस्कार किया था, वहां अब गुरुद्वारा रकाबगंज सुशोभित है जो राष्ट्रपति भवन, संसद भवन और केन्द्रीय सचिवालय के समीप स्थित है। जिस तरह चादर हमें सर्दी-गर्मी से बचाती है व हमारी रक्षा करती है उसी तरह गुरु तेग बहादुर जी ने हिन्दू धर्म, तिलक, जनेऊ व हिन्दुस्तान की रक्षा की इसलिए उन्हें ‘हिन्द की चादर’ कहा जाता है। निस्संदेह गुरु तेग बहादुर के धार्मिक स्वाधीनता के लिए दिए गए बलिदान ने औरंगजेब की धार्मिक नीति के विरुद्ध प्रतिरोध को और अधिक मजबूत किया और साथ ही साथ विकासशील सिख समाज के विकास को चरम सीमा की ओर अग्रसर किया। सनातन धर्म को मानने वाले इस बलिदान को अपने धर्म के लिए किया गया बलिदान मानने लगे और सम्पूर्ण पंजाब एवं उत्तर भारत में एक ज्वाला सी धधक उठी। सन् 1666 में जन्मे गुरु गोबिन्द सिंह जी ने 1675 में अपने पिता के हुए इस बलिदान का समाचार जब आनन्दपुर साहिब में सुना तो उन्होंने अनुभव किया कि सिख पंथ को मानने वालों ने बेशक बलिदान देकर मानवता के कोमल गुणों यथा विनम्रता, प्रेम, अहिंसा के पालन का एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है परन्तु अब समय आ गया है जब एक कुशल कारीगर की समय पर लगाई गई हथौड़े की चोट के भांति समाज को मानवता के इन्हीं गुणों की सुरक्षा करने के लिए नए मोड़ पर ले जाया जाए।
गुरु तेग बहादुर जी की शहादत ने मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी जो अन्ततोगत्वा उसके पतन का प्रमुख कारण बनी।
गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान के 24 वर्ष के भीतर 1699 की वैशाखी के दिन उनके पुत्र गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ का सृजन कर समाज के पतितों और दलितों को ऊपर उठाकर अनाथों को सहारा देकर व उनमें अपार प्राण शक्ति, आत्मसम्मान व आत्मविश्वास संचारित कर दिया। अत्याचार और अनाचार को भाग्य का दोष कहकर स्वीकार करने वाले लोगों में से उन्होंने महान शूरवीर पैदा कर दिए। मृत्यु के भय को मानों उन्होंने मंत्र के बल से उड़ा दिया। सिर हथेली पर रखकर उनके सिहों ने अन्याय व जबरन धर्मान्तरण को ललकारा व देश में नई इतिहास गाथा रच डाली। कालान्तर में 1783 में तीस हजार सिख सिपाहियों की फौज वर्तमान तीस हजारी कोर्ट (जिसका नाम इसी वजह से यह पड़ा) के स्थान से रवाना हुई व सरदार बघेल सिंह, सरदार जस्सा सिंह आहुलवालिया के नेतृत्व में मुगल फौज को हराकर दिल्ली के लाल किले पर केसरिया खालसा ध्वज फहराया।
- जसबीर सिंह, पूर्व अध्यक्ष, राजस्थान अल्पसंख्यक आयोग
Published on:
24 Nov 2025 04:40 pm
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