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समाज परिवर्तन और निर्भीक पत्रकारिता के वाहक थे कुलिश जी

राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश के जन्मशती वर्ष के मौके पर उनसे जुड़े संस्मरण साझा किए हैं, जीवन के सौवें वर्ष में प्रवेश कर चुके पं. रामकिशन ने।

karpoor chandra kulish 100th birth year

राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश के जन्मशती वर्ष के मौके पर उनसे जुड़े संस्मरण साझा किए हैं, जीवन के सौवें वर्ष में प्रवेश कर चुके पं. रामकिशन ने। 1962 में पहली बार विधायक बने पं. रामकिशन उन समाजवादी नेताओं में हैं जिन्होंने आचार्य नरेन्द्रदेव, डॉ. राममनोहर लोहिया और जेबी कृपलानी के साथ काम किया।एक बार सांसद, चार बार विधायक और जिला प्रमुख रहे पं. रामकिशन का कहना है कि कुलिश जी सदैव निष्पक्ष पत्रकारिता के पक्षधर रहे।

सरकारों को जगाने और जनता से जुड़े मुद्दों को आवाज देने में राजस्थान पत्रिका अपनी स्थापना के साथ ही आगे रहा। मैं जब 1962 में पहली बार विधायक बनकर आया तब तक राजस्थान पत्रिका की सायंकालीन दैनिक के रूप में पाठकों में गहरी पैठ बन चुकी थी। मैं भी राजस्थान के अपने गृहनगर भरतपुर में दो स्थानीय अखबारों का संपादन कर चुका था। ऐसे में चुनाव जीतने के बाद कुलिश जी से मिलने की उत्कंठा रही। इस इच्छा को पूरी किया कुलिश जी के नजदीक रहे व राजनीति में मेरे वरिष्ठ सतीश चन्द्र अग्रवाल ने जो मुझसे पहले विधायक रहे और बाद में केन्द्र में मंत्री भी रहे।

मैं, माणिक चन्द्र सुराणा व प्रो. केदार जयपुर के एमआईरोड स्थित गवर्नमेंट हॉस्टल में रहते थे। कुलिश जी ने अखबार के भविष्य की योजनाएं साझा की तो सतीश जी के साथ हम चारों ने राजस्थान पत्रिका के लिए अपनी तरफ से कुछ आर्थिक सहयोग भी दिया था। कुलिश जी की यों तो तब से ही जनसंघ के दिग्गज रहे पूर्वमुख्यमंत्री और देश के उपराष्ट्रपति पद तक पहुंचे भैंरोसिंह शेखावत से मित्रता थी।

लेकिन खबरों में उन्होंने कभी इसकी वजह से पक्षपात नहीं किया।विधानसभा में बोलने वाले हर सदस्य की बात वे अखबार में रखते थे। न केवल खबर बल्कि अपने विचार भी जिनसे हमें काफी सीखने को मिलता था। सही मायने में वे समाज परिवर्तन के ऐसे वाहक थे जिनके लेखन के आधार पर सरकारें अपनी नीतियां तय करती थीं। आपातकाल के दौरान पूरे राजस्थान की यात्रा कर अपनी बात अखबार में कहने का भी उनका अनूठा प्रयास था।

पत्रिका में प्रकाशित ‘आओ गांव चलें’ स्तंभ तो हम जैसे राजनेताओं के लिए गांवों की तस्वीर जानने का माध्यम था ही सरकारों के लिए भी जनता के अभाव-अभियोग समझने व उसके अनुरूप नीतियां बनाने में मददगार रहता था। वेद विज्ञान के क्षेत्र में कुलिश जी ने जितना कुछ पढ़ा और लिखा वह अविस्मरणीय है। ऐसे समय में जब जनजीवन पर पश्चिम का असर पड़ता दिखाई देता है उन्होंने वेदों के गूढ़ रहस्यों को उजागर कर जनता में इनके अध्ययन के प्रति चेतना लाने का बड़ा काम किया।

कुलिश जी से जुड़े कुछ स्मरण आज भी जेहन में हैं।संयोगवश कुलिश जी के साथ मेरा भी यह जन्मशती वर्ष है। मेरी कद-काठी देखकर कुलिश जी समझते थे कि मैं उनसे उम्र में बड़ा हूं। वे वर्ष 1925 में 20 मार्च को जन्मे और मैं 28 मार्च को। एक बार मिलने गया तो मेरी जन्मतिथि पूछ ली। पता चला तो ठहाका लगाकर बोले-अरे ! तुम तो मुझसे आठ दिन छोटे हो। मैं तुम्हें पंडित जी नहीं रामकिशन ही कहूंगा।

हालांकि यह उन्होंने विनोदी स्वभाव की वजह से कहा था। वे मुझे पंडित जी कहकर ही सम्बोधित करते रहे। विधानसभा में मेरे भाषणों को सुनकर कुलिश जी को मेरे ज्यादा पढ़े-लिखे होने का अनुमान था। एक बार विधानससभा परिसर में पूछ ही लिया कि मैंने पीएच.डी कहां से की है? मैंने बताया कि सिर्फ मैट्रिक पास हूं तो उन्हें अचरज हुआ। कुलिश जी की सबसे बड़ी ताकत जो मुझे राजनीतिक क्षेत्र में काम करते हुए आकर्षित करती रही वह थी उनमें संघर्ष करने का भाव और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता। खुश हूं कि पत्रिका कुलिश जी के सिद्धांतों पर कायम रहते हुए निर्भीक पत्रकारिता की मिसाल बनी हुई है।