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अव्यय पुरुष ब्रह्मा की प्रथम सृष्टि है सूर्य। अव्यय पुरुष की पांच कलाएं हैं—आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक्। यहां प्राण ही परा प्रकृति रूप में कार्य करते हैं। अक्षर देव सृष्टि है। वाक् यहां अपरा रूप प्रकृति है, क्षर सृष्टि है। इन्हीं को एनर्जी और मैटर कहा जाता है। मूल में एनर्जी ही मैटर बनती है, सूक्ष्म ही स्थूल बनता है। दोनों एक ही हैं, अर्द्धनारीश्वर हैं। बाहर नर हैं, तो भीतर नारी भी हैं।
व्यक्ति को अपने स्वरूप का ज्ञान होना कठिन है क्योंकि वह स्वयं प्राण रूप है, सूक्ष्म है। इतना ही नहीं, सूर्य रूप होने से सूर्य के गुणों से युक्त भी है। वही सहस्रशीर्षा-सहस्राक्ष-सहस्रपाद है, वही विराट भी है और विभूति भी—
सर्वत: पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वत: श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।। (गीता 13.14)
यही वसुधैव कुटुम्बकम् का रहस्य भी है। सूर्य पुत्र सूर्य ही तो है। वही आत्मा पंचाग्नि के रूप में देह धारण करता है। वही शब्द ब्रह्म है, वही अर्थ-ब्रह्म है। प्रश्न यही उठता है कि आत्मा वही, देह भी वही, तब मैं कौन? मनुष्य जीवन का यही शाश्वत प्रश्न है।
क्या जीवन के दो ही अंग हैं—आत्मा और शरीर? नहीं! जिस प्रकार माटी का दीया-तेल, बाती और ज्योति चारों मिलकर उजियारा करने में समर्थ है, अकेला कोई भी अंधकार निवारण नहीं कर सकता। ज्योति की आयु इन तीनों की आयु पर निर्भर करती है। ज्योति के भीतर (केन्द्र में) एक और ज्योति है, जो ज्योतिषां ज्योति कहलाती है। स्थूल अग्नि में सोम समाहित रहता है, ऋताग्नि शुद्ध होता है। वह ऊपर उठकर सोम (ऋत) बन जाता है। उसी प्रकार हमारे अध्यात्म के भी चार ही धरातल है़ं—शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। प्रत्येक प्राणी इन्हीं चार अंगों से समन्वित होकर अपनी आयु का भोग कर पाता हैं।
हमारे जीवन का आलम्बन अव्यय पुरुष है। इसके केन्द्र में परात्पर रहता है- वही तो मूल ब्रह्म है। अव्यय पुरुष ब्रह्मा है। अव्यय का मन- श्वोवसीयस मन- ही हमारा आत्मा है, जिसके केन्द्र में ब्रह्म की प्रतिष्ठा है। अव्यय जीवात्मा के रूप में आगे बढ़ता है। अव्यय में ब्रह्म है, अक्षर में जीवात्मा है, क्षर शरीर-अपरा है। ब्रह्म की शक्ति माया है। नष्ट नहीं हो सकते। प्रत्येक प्राणी में दोनों साथ केन्द्रस्थ रहते हैं। यूं भी कह सकते हैं कि प्रत्येक प्राणी ब्रह्म का ही विवर्त है। माया ही ब्रह्म की पहचान कराती है। उसको स्वरूप देती है।
परा प्रकृति भी अव्यय के केन्द्र में अक्षर प्राणों के रूप में हृदय का निर्माण करती है। अव्यय शुद्ध अमृत भाव है, किन्तु परा दोनों ओर जुड़ी है। इसका एक अमृत भाग है, जो अमृत रूप है तथा दूसरा मत्र्य भाग क्षर के साथ है। यही अव्यय और क्षर के मध्य सेतु है। हृदय में ही जीवात्मा और परमात्मा- द्वा सुपर्णा रूप में प्रतिष्ठित रहते हैं। परमात्मा गुणातीत रहता है और जीवात्मा गुणयुक्त संस्था होती है।
अव्यय में ऋषि प्राण तथा अक्षर में देव प्राण कार्य करते हैं। यह सभी दिव्य शक्तियों का क्षेत्र है और अदृश्य लोक है। प्राणों का स्पन्दन है। देवराज इन्द्र ही सूर्य है, सूर्य का प्रकाश है। प्रकाश ही आकाश है। नाद आकाश का गुण है। प्रकाश और आकाश अंधकार से ही प्रकट होते हैं। प्रकाश और अंधकार भी अग्नि-सोम की भांति अविनाभूत हैं। इनमें तरतम भाव रहता है। यही मृत्यु में अमृत का आधान है।
प्रकाश ही ध्वनि रूप है। ध्वनि ही प्रकाश बन जाती है। ध्वनि आकाश का गुण है। शब्द वाक् रूप सरस्वती का क्षेत्र है। अक्षर सृष्टि का सूक्ष्म धरातल है। इसी से आगे के चारों महाभूत उत्पन्न होते हैं। पृथ्वी अन्तिम महाभूत, लक्ष्मी (स्थूल) रूपा है। लक्ष्मी के भीतर सरस्वती केन्द्रस्थ रहती है। अन्न रूप से शरीर (पृथ्वी) का निर्माण करती है। केन्द्र में सरस्वती प्रवाहित रहती है। शरीर भी लक्ष्मी है।
प्राणी अमृत-मृत्यु रूप है। यह सूक्ष्म शरीर रूप में माया के द्वारा योनि बदलता रहता है। कर्मों के अनुरूप शरीर प्राप्त करता है। नाद से सृष्टि है- महाभूत बनते हैं- अग्नि से जल, जल से पृथ्वी बनती है। शुक्र रूप जल से ही शरीर रूप पृथ्वी का निर्माण होता है। शरीर में आकृति और आयु तय होते हैं। लक्ष्मी-अपरा है। यही हमारा आत्मा (व्यक्त) है। जन्म से पूर्व तथा मृत्यु उपरान्त हम अव्यक्त रहते हैं।
सूर्य ही प्राण रूप अव्यय आत्मा बनता है। माया के आवरण में यही अक्षर जीवात्मा (अमृत-मृत्यु) तथा शरीर में अधिभूत हो जाता है। जीवात्मा तथा शरीर में ब्रह्म निर्लेप रहता है। दोनों मिलकर ब्रह्म का विवर्त कहलाते हैं। नश्वर भी हैं—परिवर्तनशील हैं। सूर्य ही विवस्वत (पुत्र) है, प्राणी है, तब मृत्यु का भय क्यों? कृष्ण भी इसी विवस्वान की बात करते हुए अर्जुन से कहते हैं। मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र मनु से कहा और मनु ने राजा इक्ष्वाकु से कहा था—
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।। (गीता 4.1)-
पार्थिव अग्नि का विरल भाग आदित्य कहलाता है, जो सूर्यपर्यन्त बारह भागों में बंट जाता है। अत: आदित्य बारह हो जाते हैं। इनमें से एक आदित्य विवस्वान् नाम से जाना जाता है। सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च-चराचर जगत् का आत्मा सूर्य है। यही बुद्धि रूप में विज्ञान आत्मा कहलाता है। यही सृष्टि का प्रथम षोडशी पुरुष (१६ कलायुक्त) है। सृष्टि प्रवर्तक है। अमृत-मृत्यु के विज्ञान भावों से समन्वित है। अमृत भाग विद्यारूप- धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य है। अविद्या, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश मृत्यु हैं। सूर्य मंत्र स्पष्ट कर रहा है—
ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यच।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।
सूर्य का जन्म स्वयंभू (पिता) और परमेष्ठी (माता) के योग से होता है। मह:लोक में इसका गर्भाधान होता है—'ममयोनि महद्ब्रह्म...’। परमेष्ठी के भृगु-अंगिरा-अत्रि प्राण ही मातृत्व का वहन करते हैं। भृगु सोम लक्ष्मी रूप देह की सामग्री है, अंगिरा ज्योति रूप आत्म संस्था से जुड़ता है। अत्रि देह रूपी आवरण को प्रकाशरोधक बनाता है। सूर्य से ज्योति-आयु-गौ रूप तत्त्व प्राप्त होते हैं। ये ही मन-प्राण-वाक् रूप आत्मा बनते हैं। ब्रह्माण्ड में भी सूर्य-मन, अन्तरिक्ष-प्राण और पृथ्वी-वाक् है। यही अव्यय-अक्षर-क्षर रूप सृष्टि है।
सूर्य विष्णु पुत्र है, विष्णु ही है। 'मध्यवर्ती नारायण:’ इसी के लिए कहा है। सूर्य को ही सत्य नारायण विष्णु कहते हैं। जगत के पिता हैं, विवस्वान के पिता हैं, तो मेरे भी पिता (आत्मा) हैं। गीता मेरा भी शास्त्र है, मेरे लिए ही कहा गया है। सूर्य ही मेरी लक्ष्मी रूपा देह भी है। तब मैं सूर्य से बाहर कहां हूं? आत्मा रूप सूर्य-पुत्र विवस्वान क्या मुझसे भिन्न है? नहीं! 'ममैवांशो जीवलोके..’ दूसरा प्रमाण है कि मैं ही कृष्ण हूं, सूर्य हूं, अव्यय हूं, आत्मा हूं, ज्योति हूं।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com
Updated on:
22 Nov 2025 09:18 am
Published on:
22 Nov 2025 09:15 am
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