
डॉ. मुकेश कुमार शर्मा
भारत आज ऐसे संवैधानिक दौर में खड़ा है, जहां केंद्र-राज्य संबंधों की खींचतान, पंचायतों की सीमित स्वायत्तता और आदिवासी अधिकारों पर बढ़ती बहस लगातार सुर्खियों में हैं। हम इन सवालों पर संविधान की धाराएं तो बार-बार पढ़ते हैं, पर यह कम ही सोचते हैं कि संविधान ने इतनी विविध और जटिल समस्याओं को समझने की क्षमता कहां से पाई। मसौदा चाहे दिल्ली में तैयार हुआ, पर उसकी ‘व्यावहारिक बुद्धि’ उन क्षेत्रों की मिट्टी से निकली जहां शासन के अनेक रूप एक साथ जीवित थे। इस भूगोल का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा था-राजस्थान।
स्वतंत्रता से पहले राजपूताना 22 से अधिक रियासतों और कई जागीरदारियों का बड़ा समूह था। जयपुर की विकसित नौकरशाही, जोधपुर का सैन्य प्रशासन, बीकानेर की कूटनीतिक परंपरा, उदयपुर की सामुदायिक पंचायत व्यवस्था और शेखावाटी की बिरादरी-सभाएं—ये सभी मॉडल एक ही समय में चलते थे। प्रशासनिक विविधता की ऐसी परतें भारत में और कहीं इतनी सघन रूप में देखने को नहीं मिलती थीं। संविधान निर्माताओं के लिए यह पूरा क्षेत्र एक जीवंत प्रयोगशाला की तरह था, जहां सत्ता, समाज और कानून के असल स्वरूप को करीब से समझा जा सकता था।
संविधान सभा में राजस्थान से जो प्रतिनिधि पहुंचे, वे केवल राजनीतिक चेहरे नहीं थे। वे उन प्रणालियों के जानकार थे, जिन्हें वे प्रत्यक्ष रूप से चलाते या देखते आए थे। जयपुर राज्य के दीवान वी. टी. कृष्णमाचारी प्रशासनिक अनुभव के आधार पर लगातार इस बात पर जोर देते रहे कि अति-केंद्रीकृत ढांचा भारत की विविधता के अनुरूप नहीं होगा। बीकानेर से जुड़े इतिहासकार-प्रशासक के. एम. पणिक्कर अपने लेखन और वक्तव्यों में यह स्पष्ट करते रहे कि संघ की स्थिरता राज्यों के अधिकार और सीमाओं की स्पष्ट परिभाषा पर टिकेगी। संविधान सभा के अभिलेखों में उनके ये विचार ‘संतुलित संघवाद’ की दिशा में महत्त्वपूर्ण संकेत देते हैं।
यह समझना भी जरूरी है कि इन विचारों को प्रत्यक्ष उद्धरण या शाब्दिक वक्तव्य के रूप में नहीं, बल्कि उनके सार और प्रशासनिक दृष्टि के रूप में पढ़ा जाता है- ऐसी दृष्टि, जिसने संविधान के अंतिम ढांचे के कई निर्णयों को प्रभावित किया।
राजस्थान ने संविधान को स्थानीय स्वशासन का व्यावहारिक आधार भी प्रदान किया। मेवाड़, मारवाड़, हाड़ौती और शेखावाटी के गांवों में पंचायतें लंबे समय से भूमि-विवाद, कर-संबंधी प्रश्न और सामाजिक निर्णयों का निपटारा करती थीं। यह परंपरा संविधान निर्माताओं के लिए यह भरोसा देती थी कि भारत जैसा देश नीचे से ऊपर बनने वाले लोकतंत्र पर ही टिका रह सकता है। इसी सोच का परिणाम था अनुच्छेद 40, जो ग्राम पंचायतों के संगठन और सुदृढ़ीकरण का मार्गदर्शन देता है।
इसके ठीक बाद आया वह अध्याय, जिसने संविधान को व्यवहार में परखा- राजस्थान का एकीकरण (1948-1950)। राजपूताना की दर्जनों रियासतों को एक इकाई में ढालना केवल राजनीतिक सहमति का प्रश्न नहीं था, यह भी परखने का अवसर था कि अलग-अलग पुलिस मॉडल, न्याय प्रणालियां और कर ढांचे एक राज्य की प्रशासनिक संरचना में कैसे समायोजित होंगे। ‘वाइट पेपर ऑन इंडियन स्टेट्स (1950)’ में राजस्थान के एकीकरण को सबसे चुनौतीपूर्ण पुनर्गठन कहा गया है। यही अनुभव बाद में राज्यों के पुनर्गठन (अनुच्छेद 3-4) को व्यावहारिक आधार प्रदान करता है।राजस्थान के दक्षिणी आदिवासी क्षेत्र- डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सिरोही और उदयपुर का हिस्सा- संविधान को एक और महत्त्वपूर्ण सीख देते हैं। यहां का वन-आधारित जीवन यह दिखाता था कि एकरूप कानून हर क्षेत्र में समान न्याय नहीं दे सकते। संविधान सभा के कई प्रतिनिधियों ने केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि मध्य और पूर्वी भारत के भी, इस तरह के क्षेत्रों के लिए अलग प्रशासनिक ढांचा अपनाने की जरूरत पर बल दिया। यही विचार बाद में पांचवीं अनुसूची के रूप में सामने आया।
इसी बहस में सिरोही क्षेत्र के गांधीवादी प्रतिनिधि गोकुलभाई भट्ट की भूमिका उल्लेखनीय है। उन्होंने ग्राम-आधारित भारतीय स्वशासन की परंपरा को पर्याप्त स्थान देने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके तर्क पंचायत व्यवस्था के बाद-के विकास में एक संदर्भ बिंदु बने।संविधान का सांस्कृतिक पक्ष भी राजस्थान से जुड़ता है। मूल संविधान की कलात्मक अलंकरण-चित्रकारी नंदलाल बोस और शांतिनिकेतन की टीम के नेतृत्व में हुई। कई कला इतिहासकार इस बात का उल्लेख करते हैं कि राजस्थान के मिनिएचर कलाकार कृपाल सिंह शेखावत इस सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़े रहे। शैलीगत समानताएं यह संकेत देती हैं कि संविधान की कलात्मक रचना में राजस्थान की परंपरा का प्रभाव मौजूद था। यह इस बात का प्रमाण है कि संविधान केवल शासन का दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक भी है।
आज जब राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता (जीएसटी के बाद), राज्यपाल की भूमिका, पंचायतों की निधि और अधिकारों तथा आदिवासी क्षेत्रों में प्रशासनिक चुनौतियों पर बहसें तेज हैं, समाधान हमें किसी बाहरी मॉडल में नहीं, बल्कि अपने ही संवैधानिक इतिहास में मिलता है। राजस्थान अपने विविध प्रशासनिक अनुभवों के कारण हमें यह याद दिलाता है कि भारतीय संघवाद की ताकत स्थानीय संवेदनशीलता, अनुभवजन्य संतुलन और विविधता के सम्मान में छिपी है- न कि किसी कठोर केंद्रीकृत ढांचे में। इसीलिए, जब भारत का संघवाद किसी कठिन मोड़ पर पहुंचता है, खोज दिल्ली से शुरू नहीं होती, वह लौटकर उसी भूमि की ओर जाती है- राजस्थान की उस अनुभव-समृद्ध मिट्टी की ओर, जिसने संविधान को दिशा ही नहीं दी, बल्कि उसकी व्यावहारिक आत्मा को आकार दिया।
Published on:
26 Nov 2025 12:45 pm
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