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कानून का नया चेहरा: दंड नहीं, न्याय पर केंद्रित

डॉ. आलोक त्रिपाठी, कुलगुरु, सरदार पटेल पुलिस विश्वविद्यालय

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भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली वर्तमान में एक ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रही है। यह केवल कानूनी ढांचे में बदलाव नहीं है, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे, नागरिक अधिकारों और तकनीकी प्रगति के समन्वय का एक जीवंत उदाहरण है। एक जुलाई 2025 को देश ने एक नई शुरुआत की, जब भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) को औपचारिक रूप से लागू कर दिया गया। तीनों आधुनिक कानूनों ने लगभग 150 वर्ष पुरानी औपनिवेशिक संहिताओं — भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता व भारतीय साक्ष्य अधिनियम — की जगह ली है।
यह परिवर्तन केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली को तकनीक-संचालित, फोरेंसिक-आधारित और नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में एक सशक्त कदम है। नई संहिताएं केवल अपराध की परिभाषा या सजा के निर्धारण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे इस पूरी प्रक्रिया में वैज्ञानिकता, पारदर्शिता और संवेदनशीलता को लाने का प्रयास करती हैं। भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की नींव अंग्रेजों ने 19वीं सदी में रखी थी। उस समय के कानून तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप थे, जो औपनिवेशिक शासन की प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करते थे। आजादी के बाद, यद्यपि समय-समय पर कई संशोधन हुए, परन्तु मूल ढांचा वही बना रहा। परन्तु 21वीं सदी की जटिल चुनौतियों जैसे साइबर अपराध, आतंकवाद, संगठित अपराध, डिजिटल धोखाधड़ी आदि के लिए इस ढांचे में मूलभूत बदलाव की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
नए कानूनों में, विशेष रूप से भारतीय न्याय संहिता ने अपराधों को फिर से परिभाषित किया है। राजद्रोह और व्याभिचार जैसे उपनिवेशकालीन प्रावधानों को हटाया गया है, जो लंबे समय से विवाद का विषय रहे हैं। इसके स्थान पर राष्ट्रीय सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, महिला सुरक्षा और बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि भारत अब दमनकारी औपनिवेशिक मानसिकता से निकलकर एक उत्तरदायी, लोकतांत्रिक और मानवाधिकार-संवेदी प्रणाली की ओर बढ़ रहा है।
नए अधिनियमों में तकनीक का जिस तरह से समावेश किया गया है, वह भारत को दुनिया के सबसे उन्नत न्यायिक तंत्रों की पंक्ति में खड़ा कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, अब डिजिटल और फोरेंसिक साक्ष्य जैसे डीएनए प्रोफाइलिंग, फिंगरप्रिंट्स, डिजिटल ट्रेस, सीसीटीवी फुटेज, मेटाडेटा और मोबाइल डेटा को प्राथमिक साक्ष्य के रूप में मान्यता दी गई है। इससे न केवल जांच की सटीकता बढ़ेगी, बल्कि न्याय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बन सकेगी। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में ई-एफआईआर, जीरो एफआईआर और इलेक्ट्रॉनिक चार्जशीट जैसी व्यवस्थाओं को लागू किया गया है। न्याय प्रक्रिया में फोरेंसिक विज्ञान की भूमिका को पहले कभी इतना महत्त्व नहीं दिया गया था, जितना अब इन नए कानूनों के तहत मिल रहा है। गृह मंत्रालय ने राज्यों के फोरेंसिक ढांचे के सुदृढ़ीकरण के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया है। अब गंभीर आपराधिक मामलों में आरोप पत्र दाखिल करने से पहले फोरेंसिक जांच अनिवार्य कर दी गई है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि केवल प्रमाण-आधारित, वैज्ञानिक रूप से सत्यापित तथ्यों पर ही आरोप तय हों और निर्दोष व्यक्तियों को झूठे मामलों में फंसाया न जा सके।
डिजिटल युग में जहां एक ओर तकनीक न्याय प्रणाली को सशक्त बना रही है, वहीं दूसरी ओर निजता की चुनौतियां भी सामने हैं। इस सन्दर्भ में ‘डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023’ को लागू कर यह सुनिश्चित किया गया है कि डिजिटल साक्ष्यों के संग्रहण, विश्लेषण और संरक्षण के दौरान नागरिकों की निजता का उल्लंघन न हो। इसके साथ-साथ गवाह सुरक्षा प्रणाली और डेटा गोपनीयता के उपायों का एक समग्र ढांचा तैयार किया गया है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया केवल तकनीकी रूप से ही नहीं, संवैधानिक रूप से भी मजबूत बन सके।
इस पूरे परिवर्तन के केंद्र में नीति निर्माण, शैक्षणिक अनुसंधान और तकनीकी नवाचार का त्रिकोण है। देश के अग्रणी विश्वविद्यालय और शोध संस्थान अब अंतःविषयक अनुसंधान पर बल दे रहे हैं। फोरेंसिक एआई मॉडल, ड्रोन-आधारित अपराध स्थल पुनर्निर्माण व भविष्यसूचक पुलिसिंग विश्लेषण जैसी उन्नत परियोजनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अब केवल विधायी सुधारों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यावहारिक नवाचारों की ओर भी गंभीरता से बढ़ रहा है।
भारत की नई न्याय प्रणाली केवल दंड देने वाली नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करने वाली बन रही है। इसका उद्देश्य अपराधियों की वैज्ञानिक तरीके से पहचान करना और न्याय प्रक्रिया को नागरिकों के लिए सुलभ, पारदर्शी और संवेदनशील बनाना है। यदि इन कानूनों के प्रति समझ बढ़ाने के लिए अधिकारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाए और तकनीकी अवसंरचना को मजबूत किया जाए तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारत शीघ्र ही ऐसे देश के रूप में उभरेगा, जहां न्याय प्रणाली न केवल तेज और सटीक होगी, बल्कि मानवीय गरिमा और संवैधानिक मूल्यों की सच्ची संरक्षक भी बनेगी। भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का यह बदलाव भारत के न्यायिक दर्शन की पुनर्परिभाषा है। यह भारत को एक ऐसे भविष्य की ओर ले जा रहा है, जहां न्याय सिर्फ एक आदर्श नहीं, बल्कि तकनीकी, वैज्ञानिक और मानवीय वास्तविकता होगा। भारत आत्मनिर्भर न्याय प्रणाली की दिशा में आत्मविश्वास से आगे बढ़ रहा है जो हर नागरिक को विश्वास दिला सके कि न्याय सुलभ है, सुरक्षित है और समयबद्ध है।