
लक्षणों की गलत पहचान बनी जानलेवा! पीठ दर्द को साइटिका समझा, हार्ट अटैक से गई मरीज की जान...(photo-patrika)
CG News: पीलूराम साहू. क्या एमडी मेडिसिन डिग्रीधारी डॉक्टर कंधा, कमर व पीठ दर्द को साइटिका का दर्द समझकर इलाज कर सकता है? ऐसा हुआ है। धमतरी के एक निजी अस्पताल के डॉक्टर ने ऐसे ही लक्षण वाले 45 वर्षीय मरीज का इलाज किया। इलाज के कुछ देर बाद मरीज की हार्ट अटैक से मौत हो गई।
परिजनों के अनुसार मरीज की मौत के बाद डॉक्टर ने भी अफसोस जताया कि लक्षण को समझ नहीं पाए और मरीज की जान चली गई। पत्रिका ने इस लक्षण को लेकर जब कार्डियोलॉजिस्ट व एमडी मेडिसिन डॉक्टरों से बात की तो स्पष्ट रूप से बताया कि ये हार्ट में खराबी के लक्षण थे। अगर धमतरी का डॉक्टर मरीज का ईसीजी टेस्ट भी करता देता तो हार्ट की समस्या का पता चल जाता।
लेकिन डॉक्टर सायटिका की बीमारी समझकर इलाज करता रहा। इससे मरीज का दर्द कम होने के बजाय बढ़ता गया है और अंत में तड़प-तड़पकर मर गया। गुरुर के 45 वर्षीय इस शिक्षक को कोई बीमारी भी नहीं थी। वह पूरी तरह फिट था और एक बार कमर दर्द के कारण अस्पताल गया था, तब डॉक्टरों ने इसे साइटिका बीमारी का नाम दिया था। जब दोबारा दर्द हुआ तो इसी पर्ची की हिस्ट्री के आधार पर इलाज करते रहे।
प्रदेश में न केवल निजी, बल्कि सरकारी अस्पतालों में इलाज में लापरवाही बरती जा रही है। यही नहीं गलत इलाज से मरीजों की जान भी जा रही है। उक्त दो केस तो एक बानगी मात्र है। लापरवाहीपूर्वक मौत से साबित करना इतना आसान भी नहीं होता इसलिए परिजन भी इस मौत को भगवान की मर्जी समझकर चुप बैठ जाते हैं।
वे डॉक्टरों व नर्सों के खिलाफ शिकायत करने के बजाय नियति मान लेते हैं। एक सीवियर डायबिटीज के मरीज का कस्बाई इलाके गुंडरदेही के निजी अस्पताल में इलाज किया गया। केस बिगड़ने पर राजनांदगांव रेफर किया गया। वहीं मरीज की जान चली गई।
मरीजों के इलाज में लापरवाही से मौत के कई केस आते हैं, लेकिन लापरवाही से मौत को साबित करना आसान नहीं है। इसलिए ज्यादातर परिजन भगवान की नियति मानकर चुप बैठ जाते हैं। ऐसे केस में भुगतना परिवार को पड़ता है। साइटिका के बजाय हार्ट संबंधी इलाज किया जाता तो जान बचाई जा सकती थी।
राजधानी के कुछ निजी अस्पताल डॉक्टरों को देने वाले वेतन का पैसा बचाने के लिए आईसीयू में एमबीबीएस के बजाय बीएएमएस, त्रिवर्षीय चिकित्सा पाठ्यक्रम या अल्टरनेटिव कोर्स करने वाले की ड्यूटी लगाते हैं। यही नहीं नाइट शिफ्ट की ड्यूटी भी करवाते हैं। जबकि इन डॉक्टरों को इमरजेंसी या गंभीर बीमारियों के इलाज या मैनेज करने का कोई अनुभव नहीं होता। यही नहीं वेंटीलेटर पर रखे मरीजों के इलाज का जिम्मा भी इन्हीं का होता है।
गंभीर बीमारी वाले 55 वर्षीय मरीज को गले में इंजेक्शन लगाना था। निजी अस्पताल के जूनियर डॉक्टर ने चेस्ट में इंजेक्शन लगा दिया। इससे हार्ट में चोट लग गई। मरीज को तेलंगाना के अस्पताल में ले जाने पर पता चला कि इंजेक्शन से हार्ट में इंटरनल ब्लीडिंग हुई थी। इससे मरीज की जान चली गई।
रिटायर्ड डीएमई डॉ. विष्णु दत्त ने कहा की 45 वर्षीय व्यक्ति को लिवर की बीमारी थी। पेट में भरे पानी को निकालने के लिए जिला अस्पताल के डॉक्टर ट्यूब तक नहीं डाल पाए। सप्ताहभर तक पानी नहीं निकाला, फिर रायपुर रेफर किया गया। तब तक बीमारी बढ़ चुकी थी। सांस लेने में तकलीफ होने पर वेंटीलेटर पर रखा गया। कुछ देर बाद मरीज की मौत हो गई।
Published on:
28 Nov 2025 08:41 am
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