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सागर की गयाजी है सीताराम रसोई, पितृपक्ष में पितरों के नाम जरूरतमंदों को भोजन रहे लोग

पितृपक्ष के पूरे पखवाड़े लोग अपने पितरों के नाम तर्पण करते हैं, तो तिथि विशेष को उनके नाम का श्राद्ध भी कराते हैं। मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष पर तर्पण तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक परिजन पितरों के नाम के पिंडदान गयाजी (बिहार) न कर आएं।

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सागर

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Reshu Jain

Sep 13, 2025

sitaram

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सागर सहित गुजरात और दिल्ली से भी कई लोगों ने श्राद्ध के लिए बुकिंग कराई, ऑनलाइन भेज रहे पेमेंट

  • हर दिन करीब 50 लोग करा रहे हैं भोजन, सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के लिए 200 लोगों की बुकिंग

सागर. पितृपक्ष के पूरे पखवाड़े लोग अपने पितरों के नाम तर्पण करते हैं, तो तिथि विशेष को उनके नाम का श्राद्ध भी कराते हैं। मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष पर तर्पण तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक परिजन पितरों के नाम के पिंडदान गयाजी (बिहार) न कर आएं। सागर में गयाजी जैसा पिंडदान स्थान तो नहीं है पर श्राद्ध के लिए पितरों की याद में भोजन कराने की विशेष जगह का स्थान सीताराम रसोई ने ले लिया है। इस बार पितृपक्ष में रोजाना यहां 50 से अधिक लोग बुकिंग कराकर गरीबों को भोजन करा रहे हैं। सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के लिए यह संख्या 200 के पार पहुंच जाएगी। खास बात यह है कि केवल सागर के ही नहीं दिल्ली व गुजरात राज्य के लोगों ने भी यहां श्राद्ध कराने के लिए बुकिंग कराई है।
समाजसेवी और इंजीनियर प्रकाश चौबे बताते है कि कई लोग शहर से बाहर के होने पर यहां आकर ही भोजन कराते हैं। इस साल गुजरात, दिल्ली, इंदौर सहित कई शहरों से लोगों ने श्राद्ध के लिए बुकिंग कराई है। समिति के सेवा कार्यों को देखते हुए सागर समेत अन्य शहरों से भी लोग उन्हें आरटीजीएस या फिर चेक से राशि भिजवा रहे हैं, ताकि जरूरतमंदों तक खाना पहुंच सके। पितृपक्ष के दौरान समिति के पास जो दान एकत्रित होता है। उससे साल भर की भोजनशाला चलाने में काफी मदद मिलती है। उन्होंने बताया कि संस्था हर दिन 700 गरीब व असहाय लोगों को भोजन कराती है। जो असहाय वृद्ध रसोई तक नहीं आ पाते हैं उन्हें रसोई के सदस्य उनके निवास पर ही खाना भेजते हैं। रसोई के सदस्यों किसी भी ऐसे वृद्ध की जानकारी मिलती है तो दूसरे दिन से खाना पहुंचने लगता है।

2003 से करा रहे हैं भोजन
इंजीनियर प्रकाश चौबे ने बताया कि 31 दिसंबर 2003 को संस्था की स्थापना की गई थी। पहले दिन ही 70 व्यक्तियों को भोजन कराया था। तब से ही यह सिलसिला चल रहा है। शुरुआत में किराए के एक भवन से गरीबों को निश्शुल्क भोजन सेवा शुरू की थी। समिति कभी किसी से दान मांगने नहीं गई। जिन्होंने खुद आगे आकर मदद करना चाही, उसे स्वीकार किया। समिति सदस्यों ने निजी व्यय और लोगों के स्वैच्छिक दान से रसोई को अनवरत जारी रखने में सफलता पाई है। वर्तमान में समिति का खुद का भवन, वाहन और अन्य संसाधन हैं। रोज यहां 700 लोगों को दोनों वक्त का भोजन परोसा जा रहा है। जो असहाय बुजुर्ग रसोई तक नहीं आ सकते उन्हें वेन से घर पर भोजन पहुंचाया जाता है।

इन सदस्यों का लगातार मिल रहा सहयोग
संस्था को चलाने के लिए लगातार समितियों के सदस्यों का सहयोग मिलता है। समिति के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र चऊदा, सदस्य कृष्णपाल ठाकुर, आलोक अग्रवाल, डब्बू मुखारया, मनोज डेंगरे, राजकमल केशरवानी, प्रभात जैन, राजेश गुप्ता, अतुल ठाकुर, राजीव चौरसिया व संजीव चौरसिया रसोई के लिए समर्पित होकर काम कर रहे हैं।