
प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल की गई तस्वीर। (फोटो- Patrika)
भारत की जेलों में बंद 70% से अधिक कैदी अब तक दोषी साबित नहीं हुए हैं। फिर भी वे वर्षों से सलाखों के पीछे हैं - अक्सर इसलिए क्योंकि वे अपने अधिकारों से अनजान हैं या उन पर भरोसा नहीं करते।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने हाल ही में नालसार यूनिवर्सिटी के स्क्वायर सर्कल क्लीनिक की रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि देश की जेलों में 74% कैदी अंडरट्रायल हैं, पर उनमें से केवल 7.91% ने ही निशुल्क कानूनी सहायता का उपयोग किया।
रिपोर्ट के अनुसार, कई कैदियों की स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं हुई है, कई परिवारों से कटे हुए हैं और कई दस्तावेजों के अभाव में मुकदमे नहीं लड़ पा रहे हैं।
गौरतलब है कि स्क्वायर सर्कल क्लीनिक को नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के फेयर ट्रायल प्रोग्राम (एफटीपी) के तहत शुरू किया गया था।
नालसार ने 2019 में एफटीपी की शुरुआत की थी और नागपुर सेंट्रल जेल और यरवदा सेंट्रल जेल (पुणे) में विचाराधीन कैदियों के साथ काम किया। एफटीपी टीम ने 2019 से अब तक 5,783 मामलों में काम किया और 1,388 कैदियों की रिहाई सुनिश्चित की।
जस्टिस नाथ ने कहा कि वकील अक्सर जमानत अर्जी बिना जरूरी दस्तावेजों के दाखिल करते हैं। गरीब आरोपी जमानत राशि या जमानतदार नहीं जुटा पाते, और 'कानून नहीं, व्यवस्था उन्हें कैद रखती है।'
उन्होंने बताया कि कई अंडरट्रायल ऐसे हैं, जिन्होंने अपराध की अधिकतम सजा से भी ज्यादा वक्त जेल में बिताया। कई लोग सिर्फ इसलिए बंद हैं क्योंकि वे जमानती अपराधों में भी जमानत नहीं दे सके।
न्याय तक पहुंच की नई पहल… रिपोर्ट के अनुसार, एफटीपी में कवर किए गए मामलों में से 67.6% आरोपी वंचित जातियों से और 80% असंगठित क्षेत्र से हैं।
जस्टिस नाथ ने कहा, 'लॉ कॉलेजों में लीगल एड क्लिनिक को जीवंत न्यायशाला की तरह चलाया जाए।' उन्होंने कहा कि युवा वकीलों को अंडरट्रायल कैदियों से मिल कर वास्तविक अनुभव लेने चाहिए।
Published on:
10 Nov 2025 08:19 am
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