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सरकार के दायित्वों की निगरानी व्यवस्था भी हो

पत्रिका समूह के संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश जी के जन्मशती वर्ष के मौके पर उनके रचना संसार से जुड़ी साप्ताहिक कड़ियों की शुरुआत की गई है। इनमें उनके अग्रलेख, यात्रा वृत्तांत, वेद विज्ञान से जुड़ी जानकारी और काव्य रचनाओं के चुने हुए अंश हर सप्ताह पाठकों तक पहुंचाए जा रहे हैं।

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भारतीय संविधान को स्वीकार करने के दिन के रूप में संविधान दिवस (26 नवम्बर) मनाया जाता है। पिछले वर्षों में संविधान पर पुनर्विचार व पुनर्लेखन की मांग उठती रही है। नब्बे के दशक की शुरुआत में भी ऐसी मांग उठी तो कुलिश जी ने अपने आलेख में इस बात पर चिंता जताई कि संविधान बनाते देश के स्वभाव, संस्कारों और व्यवहार को ध्यान में नहीं रखकर इसे जातियों, पंथों और भाषाओं में बांट दिया। उन्होंने तब 45 वर्ष में अस्सी से ज्यादा संविधान संशोधन पर भी चिंता जताई । प्रमुख अंश:
ह मारे संविधान में भारतीय जनता के स्वभाव अथव भारतीय संस्कारों को प्रमुखता देने के बजाय गौण कर दिया। हमारे संविधान का उद्घोष होना चाहिए था ‘सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे सन्तु निरामया:’, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ ‘लोको समस्ता सुखिनौ भवतु’ ‘ओम शान्ति: शान्ति: शान्ति।’ इन्हीं संस्कारों के कारण भारत ने इतिहास में कभी दूसरों पर आक्रमण नहीं किया। जब यह देश शक्ति और प्रभुता की चरम पर था, तब भी दूसरे लोगों के प्रति आदर भाव था। हमारे यहां सभी मान्यताओं के लिए फलने-फूलने की गुंजाइश थी। अपनी मान्यताओं को दूसरों पर थोपने के आचरण शासकों के कभी नहीं रहे। सम्राट अशोक के पुत्र-पुत्री और भिक्षुओं ने भारत से बाहर जाकर विदेशों में बौद्ध धर्म का जो प्रचार किया, वह भी सैनिकों के जोर से या थैलियों के सहारे नहीं, बल्कि वाणी के बल पर किया। ऐसे देश का संविधान बनाते समय हमने इसके संस्कारों को, स्वभाव को और व्यवहार को ध्यान में न रखकर देश को जातियों, पंथों और भाषाओं में बांट दिया। संविधान में समानता, स्वतंत्रता और न्याय का उद्घोष भले ही किया गया हो, उसमें जगह-जगह पैबन्द लगे हुए हैं जो भारत के स्वरूप को विदू्रप बनाते हैं। देश का नाम ही ‘इंडिया देट इज भारत’ इस बात का ज्वलन्त प्रमाण है।
संविधान में धर्मनिरपेक्षता का समावेश होने के बाद एक नया शब्द गढ़ लिया गया है ‘कम्पोजिट कल्चर’ अर्थात् ‘समन्वित संस्कृति’ इसका भी मनमाना अर्थ लगाकर इसे धर्म के साथ जोड़ा जा रहा है। संस्कृति और धर्म दो अलग-अलग चीजें हैं। परन्तु हमारे नेता, देशवासियों को समझाते हैं कि हमारे देश में मिली-जुली संस्कृति चली आ रही है। इन नेताओं को कौन समझाए कि दुनिया के सभी देशों में सब धर्मों के अनुयायी रहते हैं। अपने-अपने ढंग से उपासना करते हैं। धर्म प्रधान शासन वाले देश कतिपय देश इसका अपवाद है, परन्तु उन देशों में सेक्यूलर होना अपराध समझा जाता है। धर्म निरपेक्षता ने ऐसा क्या दे दिया जो पहले से देश में नहीं है। दुनिया का कोई देश धर्मनिरपेक्षता की दुहाई नहीं देता और किसी संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
अखण्ड भारत की संभावना को स्थान देते
ह मारे संविधान में एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें अखण्ड भारत के सिद्धांत को मान्यता नहीं दी गई। यह देश द्वि-राष्ट्रवाद की भावभूमि पर विभाजित हुआ। हमने द्वि-राष्टवाद को सिद्धांत रूप में स्वीकार नही किया बल्कि मजबूरी में किया। हमें चाहिए था कि कि अखण्ड भारत की सम्भावना को संविधान में स्थान देते। हमने यह नहीं सोचा कि कभी ये टुकड़े फिर मिल सकते हैं। हमने तो भावी पीढ़ी तक के लिए रास्ता खुला नहीं रखा। भारत के संविधान की प्रस्तावना में कई प्रकार की घोषणाएं अर्थात उद्देश्यों की व्यवस्था दी गई हैं और उसमें मौलिक अधिकारों का प्रावधान भी किया गया है। जहां सरकार के दायित्वों का बोध कराया गया हैं, वहां ऐसी भी व्यवस्था होनी चाहिए, जो उन दायित्वों के निर्वाह की देखरेख करे। निगरानी के अभाव में हमारे संविधान का पूर्णत: राजनीतिकरण हो गया है।
(25 जून 1995 के अंक में ‘सही माने में संविधान बने ’ शीर्षक आलेख से)
राजनीतिक सुविधा का दस्तावेज ही माना
क तिपय उदाहरणों से समझा जा सकता है कि हमने संविधान को भारत राष्ट्र का मानचित्र बनाया ही नहीं और उसे एक राजनीतिक सुविधा का दस्तावेज ही माना। संविधान में 45 वर्ष में 80 से अधिक संशोधन होना ही यह सिद्ध करने के लिए काफी है। आज भी कोई-कोई ऐसा मसला खड़ा होता रहता है जिसे निपटाने के लिए संविधान को ही सहज नुस्खा माना जाता है। संविधान पर पुनर्विचार करते समय हमें एकाध बिन्दुओं पर नहीं बल्कि समग्र दृष्टि से विचार करना होगा। क्यों न एक बार फिर संविधान परिषद का गठन किया जाए।
(कुलिश जी के आलेखों पर आधारित पुस्तक ‘दृष्टिकोण’ से )